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डाॅ.पुष्पलता के बाल उपन्यास 'दूब का बंदा' को मिला साहित्यजगत में सम्मान

टीवी कल्चर में लुप्त होते बाल साहित्य के बीच डाॅ. पुष्पलता के बाल उपन्यास ‘दूब का बन्दा’ को लेकर तमाम साहित्यकारों की सम्मतियां प्राप्त हुई हैं।

डाॅ.पुष्पलता के बाल उपन्यास दूब का बंदा को मिला साहित्यजगत में सम्मान
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मुजफ्फरनगर। नगर की प्रमुख साहित्यकार तथा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री दीपक कुमार की धर्मपत्नी डाॅ.पुष्प लता का नया बाल उपन्यास साहित्य जगत में विशेष स्थान बना रहा है। 'दूब का बंदा' नाम का यह बाल उपन्यास बाल मनोविज्ञान और मनोवृत्तियों का दस्तावेज है।

टीवी कल्चर में लुप्त होते बाल साहित्य के बीच डाॅ. पुष्पलता के बाल उपन्यास 'दूब का बन्दा' को लेकर तमाम साहित्यकारों की सम्मतियां प्राप्त हुई हैं। झाबुआ मध्य प्रदेश के डाॅ. रामशंकर चंचल उपन्यास ने इस कृति की सराहना करते हुए कहा कि नायक द्वारा अंत में ये कहना कि अपने दादू की इज्जत कभी कम नहीं होने देगा। 60 पेज का सहज सुखद, सामयिक प्रभाव शाली, विचारणीय, प्रेरक, सही दिशा- निर्देश देने वाला, बाल मन को प्रभावित कर उसे रास्ता दिखाने वाला है। पात्र राहुल का सुखद अहसास सदा बाल मन को स्मरण रहने वाला है। उनका कहना है कि यादगार, सटीक जानकारी देता एक ऐसा उपन्यास है। दूब का बन्दा जो बाल हिन्दी साहित्य में सदा अपने समय को याद दिलाता, प्रेरणा देता रहेगा। डाॅ. पुष्पलता जी सचमुच खूब बधाई की हकदार हैं कि आज जब बाल साहित्य हाशिये पर खड़ा है ऐसे समय डाॅ पुष्पलता जी का यह उपन्यास मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने कहा कि सहज यथार्थ,, बाल मन का खूब सूरत चित्र हमारे सामने रखता है। यह बच्चों के मन, मस्तिक को अवश्य प्रभावित करेगा। बच्चों की बातचीत के माध्यम से खूब सहजता से अपनी बात रखती हैं डाॅ. पुष्पलता जी। देखे सहज बानगी...

सुन यार, तेरे पास कितने पैसे हैं। राहुल ने पूछा

तीस रुपये, पुलकित बोला

तेरे पास? राहुल ने गगन से पूछा,

पचास

बच्चों की सहज बातचीत उपन्न्यास का यथार्थ दशार्ती है। भाषा शैली पात्रों के अनुकूल सहज सरल होना उपन्न्यास के प्राण है ।कोई भी बाल पाठक एक बार उपन्न्यास पढ़ना आरंभ करेगा तो पूरा एक बैठक पर ही पढ़ना चाहेगा। यह उपन्न्यास प्रवाह और प्रभावशीलता दर्शाता है। जो वंदनीय है। बधाई देते हुए उन्होंने इसे अविस्मरणीय और यादगार बताते हुए कहा कि आगे भी डाॅ. पुष्पलता से बाल साहित्य आशा रखता है। सचमुच उन्होंने खूब सहज, सरल ,बाल मन को छू जाने वाला उपन्न्यास लिखा है । आज बाल साहित्य अच्छे हालातों में नहीं है ऐसे समय आपकी यह कृति खूब मूल्यवान और महत्वपूर्ण साबित होगी।

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