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नेता गिरी के नाम पर उद्योगों से रंगदारी मांगने का धंधा

सरकार के एक कद्दावर मंत्री और भाजपा, रालोद और भाकियू के नेताओं के नाम का भी कुछ लोग गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी तरह की गुंडागर्दी के चलते यूपी स्टील्स ने तालाबंदी की घोषणा कर दी थी।

नेता गिरी के नाम पर उद्योगों से रंगदारी मांगने का धंधा
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मुजफ्फरनगर। कोरोना संकट काल के दौर में भी उद्योगों ने प्रदेश सरकार की नीतियों के अनुसार दिन रात काम किया, सेनिटाइजर निर्माण हो या उत्पादन बढाकर अर्थव्यवस्था को संभालने जैसी चुनौती, उद्योग सरकार के सहयोग में तत्पर नजर आये, लेकिन इन्हीं उद्योगों को सुरक्षा के लिए बड़ी चिंता का सामना करना पड़ता है। कहीं इन उद्योगों के स्वामियों को शोषण के लिए विवश होना पड़ता तो कहीं इनके अधिकारियों व कर्मचारियों को जानलेवा हमलों का शिकार होना पड़ता है। प्रदूषण को एक बड़ा हथियार बनाकर उद्योगों के खिलाफ बड़ी साजिश रचने वाले गिरोह काम कर रहे हैं, ये लोग जनसमस्या को सामने रखकर ग्रामीणों को भ्रमित कर भीड़ के सहारे अपने स्वार्थों या यूं कहिए कि एक तरह से उद्योगों से रंगदारी मांगने के लिए दबाव बनाने का अवैध कारोबार चला रहे हैं। सरकार के एक कद्दावर मंत्री और भाजपा, रालोद और भाकियू के नेताओं के नाम का भी कुछ लोग गलत इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी तरह की गुंडागर्दी के चलते यूपी स्टील्स ने तालाबंदी की घोषणा कर दी थी।

काली नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए जिला प्रशासन द्वारा बड़ा अभियान चलाया जा रहा है। इसके लिए उद्योगों के द्वारा भी समय समय पर बड़ा सहयोग दिया जाता रहा है। इसके बाजवूद भी जल प्रदूषण के लिए काली नदी के आसपास चल रहे उद्योगों को जिम्मेदारी बताकर इन उद्योगों के मालिकों पर दबाव बनाने का बड़ा खेल खेला जा रहा है। काली नदी अपने उद्गम स्थल सहारनपुर से ही प्रदूषित है और अंत तक इसका यही हाल है। जनपद मुजफ्फरनगर में काली नदी के आसपास उद्योग संचालित हो रहे हैं। इन उद्योगों को लेकर समय समय पर प्रदूषण विभाग के अधिकारियों के साथ ही अन्य विभागों के अफसर भी मानकों की जांच पड़ताल के लिए निरीक्षण करते रहते हैं। प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए उद्योगों का प्रयास यही रहता है कि शासन और प्रशासन के अभियानों को सार्थक बनाया जाये, लेकिन इस प्रदूषण के नाम पर कुछ लोग गुण्डागर्दी के सहारे इन उद्योगों का सिरदर्द बने हुए हैं। यह भी बात छिपी नहीं है कि उद्योगों में ठेकों के वर्चस्व को लेकर गुण्डा एलीमेंट हमेशा ही कानून व्यवस्था को लेकर भी खतरा बने रहते हैं। जनपद में हाल ही में मन्सूरपुर डिस्टलरी का मामला सुर्खियों में है। यहां पर भी ठेकेदारी के वर्चस्व को लेकर कई बार फैक्ट्री के अधिकारियों पर दबाव बनाने के लिए झूठी शिकायतों, असामाजिक तत्वों के सहारे धमकी दिलाने और मारपीट व जानलेवा हमले की घटनाओं को अंजाम दिया जाता रहा है। पूर्व की बात करें तो फैक्ट्री की वाइस प्रेजीडेंट तक पर भी हमला कराया गया था। इसके पीछे केवल और केवल फैक्ट्री को अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए एक दुधारू गाय की तरह ही प्रयोग करने का उद्देश्य रहा है। जहां तक मन्सूरपुर डिस्टलरी को लेकर की गयी शिकायत का मामला है, गांव बोपाडा में प्रदूषित जल आने को मुख्य मुद्दा बनाकर फैक्ट्री पर दबाव बनाने का प्रयास किया गया। अगर देखा जाये तो किसी शिकायत का स्तर यही होता है कि इसमें उसका उचित निस्तारण कराया जाये। गांव बोपाडा में ग्रामीणों को भ्रमित करते हुए जिस प्रकार से प्रदूषण अधिकारी को बन्धक बनाकर उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया, वह प्रशासन को काफी अखरा। फैक्ट्री की ओर से कभी भी समस्याओं से अनदेखी नहीं की गयी, बल्कि क्षेत्र के ग्रामीणों के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए उद्योग हमेशा ही संवेदनशील रहे हैं। इसके बाद भी उद्योगों के प्रति इस तरह की आपराधिक गतिविधियों से उद्योगों में भी असुरक्षा की भावना जागृत रहती है। काली नदी के आसपास के गांवों में उदगम से अंत तक प्रदूषित पानी की समस्या बनी है, लेकिन क्या केवल इसके लिए सिर्फ उद्योगों को ही दोषी ठहराया जाना न्यायोचित हो सकता है। उद्योग मंदी के दौर में भी अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने में जुटे हैं, लेकिन इस प्रकार की गुण्डागर्दी, रंगदारी का दबाव, आपराधिक स्तर पर धमकियों से उद्योगों पर मंडराने वाले खतरों से निपटने के लिए भी कोई सख्त नीति बनाकर ऐसे लोगों को सबक सिखाया जाना भी समय की आवश्यकता है, जोकि भोले भाले ग्रामीणों को समस्याओं के नाम पर जमा कर उनके हाथों से ही कानून व्यवस्था खराब कराते हुए अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए अनैतिक और आपराधिक दबाव बनाने का गोरखधंधा चला रहे हैं।

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