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क्यों जिंदगी बने बोझ!

क्यों जिंदगी बने बोझ!
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जिस जिंदगी के लिए आदमी जिंदगी भर जद्दोजहद करता है उसे जरा से तनाव या आवेश में खो देना बेहद दुर्भाग्य पूर्ण है। यही नहीं यह मूर्खता पूर्ण भी है। हाल में केंद्रीय अपराध ब्यूरो ने जो आंकडे जारी किए हैं, वे चैंकाने वाले हैं। हालांकि यह आंकडे पिछले वर्षों के है, लेकिन लाॅकडाउन के बाद कई तरह की समस्याओं के बीच लोगों की जीवन शैली में बड़ा बदलाव आया है। इसमें जहां लोगों को परिवार के साथ रहने के अवसर के चलते नया संबल मिला है, वहीं कई बार परिवार से अलगाव होने की स्थिति में कुछ लोगों को बेहद बुरी स्थिति से गुजरना पडा है। अनेक लोगों को पूर्ण या अर्ध बेरोजगारी की स्थिति से जूझना पडा है। बहुत से लोग इन हालात में अकेले पड़ गए औन तनाव का शिकार भी हो रहे हैं। कई अन्य कारणें से जिंदगीपर बुरा असर पड़ रहा है। हालांकि आत्महत्या में मामलों में हर आय और आयु वर्ग के लोग शामिल हैं। ऐसे में सबके तनाव की स्थितियां अलग-अलग हैं। ऐसे में आत्महत्या के कारणों में किसी व्यक्ति की संपन्नता या विपन्नता से कोई संबंध नहीं है। युवाओं में यह प्रवृत्ति अधिक है लेकिन इन दिनों तो हर आयु वर्ग में भी आत्महत्या के मामले बढ़ते जा रहे हैं। ऐसी खबरें भी रोज सामने आ रही हैं कि किसी परेशानी से आजिज आकर परिवार के सदस्यों ने सामूहिक रूप से आत्महत्या कर ली या फिर किसी व्यक्ति विशेष ने आत्महत्या की या फिर उसने इसका प्रयास किया।

यह बेहद जरूरी है कि परिवार में आए किसी भी संकट में उसकी एकजुटता ही उसे बचाती है। आत्महत्या करने के कारण अनेक हो सकते हैं, लेकिन मौजूदा दौर में आत्महत्या के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, उसका एक प्रमुख कारण आर्थिक समस्या तथा पारिवारिक जिम्मेदारियों को ना निभा पाने के कारण उपजा तनाव है। खासतौर से लाॅक डाउन के बाद आम व्यक्ति जितना तनावग्रस्त है, वैसी स्थिति अतीत में पहले कभी नहीं थी। लोगों की तेजी से बदलती जीवनशैली, रहन-सहन और भौतिक वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आकर्षण, पारिवारिक विघटन और बढ़ती बेरोजगारी और धन-दौलत को ही सर्वस्व समझने की प्रवृत्ति के कारण आत्महत्या के मामले बढ़ते जा रहे हैं। प्रतिदिन सामने आ रही आत्महत्याओं की खबरें सामाजिक व्यवस्था की त्रासद स्थिति को बयनं करती है। जिस जिंदगी के लिए आदमी संघर्ष करना है उसी को खुद अपने हाथों से खो देने के लिए आत्महत्या का शब्द बेहद डरावना लगता है। ऐसा मंजर जो दिल को दहलाता है, डराता है, खौफ पैदा करता है, दर्द देता है। वास्तव में इसकी पीडा वे जानते हैं जिनका कोई अपना आत्महत्या कर लेता है और दुनिया से चला जाता है।कई बार पढाई के दबाव में विद्यार्थी, कभी कोई व्यापारी अथवा किसान, कभी कोई सरकारी कर्मी तो कभी कोई असफल प्रेमी अपनी जिंदगी के साथ खिलवाड करता दिखाई देता है। आंकडों के अनुसार विश्व में हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है, इस तरह वर्ष से आठ लाख से अधिक लोग आत्म हया कर लेते हैं। बडी संख्या में ऐसे भी लोग है जो आत्महत्या का असफल प्रयास करते हैं। भारत में आत्महत्या के प्रमुख कारणों में बेरोगजारी, बीमारी, प्रेम में असफलता, पारिवारिक कलह, दांपत्य जीवन में संघर्ष, गरीबी, मानसिक विकार, परीक्षा में असफलता, आर्थिक विवाद, राजनैतिक परिस्थितियां होती हैं। एक तथ्य यह भी है कि स्त्रियों की अपेक्षा पुरुष अधिक आत्महत्या करते हैं।

विशेषज्ञ ऐसे में तनाव से बचने की सलाह देते हैं। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस प्रतिवर्ष 10 सितंबर को मनाया जाता है, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ;डब्ल्यूएचओद्ध के सहयोग से अंतर्राष्ट्रीय एसोसिएशन फाॅर आत्महत्या रोकथाम ;इंटरनेशनल एसोसिएशन फाॅर सुसाइड प्रवेंशन-आईएएसपीद्ध द्वारा आयोजित किया जाता है। आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए सामाजिक और परिवारिक स्तर पर पहल की जरूरत है। कइ बार अचानक ऐसे फैसले लिए जाते हैं तो कई बार पहले से इस बात का आभास किया जा सकता है कि कोई व्यक्ति किन्हीं कारणों से तनाव में हैं। ऐसे में परिवार के लोगों और मित्र परिचित ऐसे मामलों में खास भूमिका निभा सकते हैं। संपर्क, संवाद और देखभाल से आत्महत्या को काफी हद तक रोका जा सकता है। परिवार में आर्थिक समस्याओं को लेकर खास तौर से परिवार के लोगों की जिम्मेदारी बनती है कि वे ऐसी स्थितियों को अपने ऊपर हावी ना होने दें। विद्यार्थियों पर कैरियर एवं ऊंचे अंक का दबाव बनाने वाले स्कूलों, अभिभावकों एवं अध्यापकों को भी अपनी सोच बदलने के लिये सकारात्मक वातावरण बना सकते हैं। इसके अलावा इस समय लाॅक डाउन के बीच आर्थिक समस्याओं के चलते होने वाले तनाव को दूर करने के लिए परिवार, समाज और सरकार तीनों को मिलकर सकारात्मक कदम उठाने की जरूरत है।

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