कोरोना ने बदला स्वास्थ्य सेवा का चेहरा, अब स्टेथोस्कोप नहीं थर्मल स्कैनर बना डाक्टर की पहचान

जनपद मुजफ्फरनगर की ही बात करें तो यहां पर सरकारी और निजी सभी अस्पतालों में मरीज और चिकित्सक के बीच बने रिश्तों में काफी सोलश डिस्टेंस दिखाई देता है।

Update: 2020-08-14 06:44 GMT

मुजफ्फरनगर। कोरोना वायरस संक्रमण ने वैश्विक महामारी का रूप लेकर जीवनशैली को ही बदलने का काम किया है। हर क्षेत्र में इसका प्रभाव साफ नजर आ रहा है, लेकिन मेडिकल क्षेत्र में कोरोना के कारण सारी व्यवस्था ही बदली हुई नजर आती है। अब डाक्टर किसी भी मरीज के पास जाने से कतरा रहा है। मरीज को देखने से पहले पूरी तरह से उसके स्वस्थ होने की तसल्ली की जाती है और वह दौर अब नजर नहीं आता, जबकि डाक्टर मरीज को अपने पास बैठाकर गले में पड़े स्टेथोस्कोप से पूरी तसल्ली से उसकी बीमारी को पकड़ने के लिए परीक्षण किया करता था। अब थर्मल स्कैनर और पल्स आॅक्सीमीटर डाक्टरों के नये पैमाने बन गये है।

सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केन्द्रों से लेकर छोटे बड़े निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम्स में मरीजों को देखने के नियम कायदे ही बदल गये हैं। कुछ स्थानों पर तो डाक्टर बिना कोविड-19 टेस्ट के मरीजों का उपचार करने को ही तैयार नहीं है। सरकारी अस्पतालों में जो भीड़ चिकित्सकों को घेरे रखती थी, वह भीड़ भी नदारद है और चिकित्सक भी अपनी सुरक्षा के प्रति ज्यादा चिंतित तथा सतर्क नजर आते हैं।

कोरोना वायरस संक्रमण के कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ा है। जनपद मुजफ्फरनगर की ही बात करें तो यहां पर सरकारी और निजी सभी अस्पतालों में मरीज और चिकित्सक के बीच बने रिश्तों में काफी सोलश डिस्टेंस दिखाई देता है। चिकित्सक अपने सुरक्षा के प्रति इतने सतर्क हैं कि स्वस्थ नजर आने वाले मरीजों को देखने से पहले वह जांच पर भरोसा व्यक्त कर रहे हैं। यहां तक की मरीजों को डाक्टर के कैबिन में भी अब अपनापन नजर नहीं आता है। चिकित्सकों को शीशे के एक पर्दे के पीछे बैठा देखा जाता है। मरीज और तीमारदार दूर खड़े रहकर अपनी बीमारी के बारे में चिकित्सक को बताते दिखाई देते है। कोरोना काल से पहले चिकित्सक और मरीज के बीच जो आत्मीय रिश्ता था, वह इस संकट में सोशल डिस्टेंस की शर्त के कारण दूर होता चला गया है। अब चिकित्सकों के गले में स्टेथोस्कोप नहीं बल्कि उनके हाथों में थर्मल स्कैनर नजर आने लगे हैं। जिला सरकारी अस्पताल, जहां पर डेढ़ से दो हजार नये मरीज प्रतिदिन अपना पंजीकरण कराने के बाद ओपीडी में चिकित्सकों के कैबिनों को घेरे रहते थे, वहां पर ओपीडी का मतलब ही बदल गया है।

चिकित्सक मरीजों को देख रहे हैं, उनको उपचार दे रहे हैं, जांच भी हो रही हैं, लेकिन यह संख्या हजारों से अब सैंकड़ा भर रह गयी है। जो चिकित्सक स्टेथोस्कोप के सहारे मरीज को अपने पास स्टूल पर बैठाकर रक्त धमनियों के प्रवाह का परीक्षण करते हुए नजर आते थे, वह लोहे के चैनल के पीछे एक शीशे का सहारा लेते हुए मरीजों का उपचार सोशल डिस्टेंस से कर रहे हैं। यहां तक की गर्भवती महिलाओं की डिलीवरी से पहले सरकारी और निजी अस्पतालों में कोविड टेस्ट कराया जा रहा है। मास्क और सेनिटाइजर अनिवार्य कर दिये गये हैं। चिकित्सका के क्षेत्र में यह बदलाव मरीजों के लिए कुछ परेशानी का सबब तो बने हैं, लेकिन इस महामारी में इसको आवश्यक माना जा रहा है। जिला चिकित्सालय में फिजीशियन एवं वरिष्ठ चिकित्सक डा. योगेन्द्र त्रिखा कहते हैं, ''कोरोना संक्रमण की रोकथाम केवल सोशल डिस्टेंस, मास्क और सेनिटाइजर के साथ ही कुछ अन्य सावधानी बरतकर की जा सकती है। वह मानते हैं कि इस महामारी ने चिकित्सा सेवाओं को सर्वाधिक रूप से प्रभावित किया है। चिकित्सा कर्मियों के सामने भी कई चुनौतियां हैं। आज थर्मल स्कैनर और पल्स आॅक्सीमीटर ने स्टेथोस्कोप का स्थान ले लिया है। हमें इन बदलाव को स्वीकार करना चाहिए। कभी कमरा नम्बर एक में 300 से 400 मरीजों की ओपीडी करने वाले डा. त्रिखा आज सीएमएस कार्यालय के बरामदे में बन्द चैनल के पीछे मात्र 50-100 मरीजों की ओपीडी कर रहे हैं।''

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