undefined

55 साल की राजनीति में पहली बार बिखरा स्वरूप परिवार

मुजफ्फरनगर जनपद के सियासी घरानों में बड़ी दखल रखने वाले स्वरूप परिवार में राजनीतिक महत्वकांक्षा ने आखिरकार दरार पैदा कर दी है। टिकट की लड़ाई में आमने सामने आने वाले दो भाई अब सियासी चोला बदलकर पूरी तरह से एक दूसरे के खिलाफ हो चुके हैं।

55 साल की राजनीति में पहली बार बिखरा स्वरूप परिवार
X

मुजफ्फरनगर। मुजफ्फरनगर जनपद के सियासी घरानों में बड़ी दखल रखने वाले स्वरूप परिवार में राजनीतिक महत्वकांक्षा ने आखिरकार दरार पैदा कर दी है। टिकट की लड़ाई में आमने सामने आने वाले दो भाई अब सियासी चोला बदलकर पूरी तरह से एक दूसरे से सियासी कुश्ती के लिए अखाड़े में कूद पड़े हैं। गौरव स्वरूप के भगवा धारण करने के बाद अब स्वरूप पूरी तरह से राजनीतिक पैमाने पर दो फाड़ हो चुका है।

मुजफ्फरनगर जनपद का राजनीतिक इतिहास कई परिवारों की सियासी विरासत को भी संजोये हुए है। इन्हीं सियासी परिवारों में मुजफ्फरनगर सदर सीट से राजनीति कर यूपी की सियासत में मुकाम हासिल करने वाला स्वरूप परिवार भी है, लेकिन राजनीतिक महत्वकांक्षा का ऐसा ग्रहण इस परिवार को लगा कि 55 साल की राजनीतिक उपलब्धि रखने वाला यह परिवार टिकट की लड़ाई में आज बिखरा हुआ नजर आ रहा है। मुजफ्फरनगर सदर सीट पर स्वरूप परिवार का सियासी इतिहास और दखल साढ़े पांच दशक पुराना हो चुका है। करीब 55 साल से राजनीति करने वाले इस परिवार में कई मोड़ ऐसे आये, जबकि राजनीतिक कारणों से परिवार टूटने के कगार पर पहुंच गया था, लेकिन परिवार के बड़े बुजुर्गों के दखल ने परिवार को एक मुट्ठी ही रहने पर विवश कर दिया। 55 साल के बाद आज फिर से यह परिवार राजनीतिक महत्वकांक्षा के कारण टूट की दहलीज पर पहुंचा, लेकिन इस बार इस टूट को बचाने के लिए बुजुर्गों की कोशिश काम नहीं आई और टिकट की लड़ाई ने दो भाईयों को राजनीतिक दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया।

स्वरूप परिवार के राजनीतिक सफर की शुरूआत प्रदेश के चौथी विधानसभा के गठन के लिए हुए चुनाव से हुई। वर्ष 1967 में स्वरूप परिवार से विष्णु स्वरूप उर्फ शाहजी ने चुनाव मैदान में अपना भाग्य आजमाया। वैश्य राजनीति का केन्द्र बनी रहने वाली इस सीट पर हुए चौथे चुनाव में विष्णु स्वरूप ने निर्दल पर्चा भरा और भारतीय जनसंघ की प्रत्याशी मालती शर्मा को पराजित कर चुनाव जीता। इस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी केशव गुप्ता तीसरे नम्बर पर रहे थे। यह चुनाव काफी कांटे का रहा। रोमांचक मुकाबले में विष्णु स्वरूप 782 वोटों के अंतर से विधायक बने। इससे अगला चुनाव 1969 में हुआ और विष्णु स्वरूप या स्वरूप परिवार से कोई चुनाव मैदान में नहीं उतरा। बीकेडी के प्रत्याशी सईद मुर्तजा ने केशव गुप्ता कांग्रेस को पराजित कर सीट जीती, लेकिन 1974 के चुनाव में विष्णु स्वरूप की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए उनके छोटे भाई पूर्व राज्यमंत्री चितरंजन स्वरूप ने कांग्रेस से टिकट पाने में सफलता हासिल की और सदर सीट की चुनावी जंग को जीतकर चितरंजन स्वरूप पहली बार विधानसभा पहुंचे, तभी से स्वरूप परिवार की राजनीतिक विरासत को चितरंजन स्वरूप संभाले रहे। इस बीच परिवार में कई बार राजनीतिक महत्वकांक्षा के कारण विवाद हुए। चितरंजन स्वरूप को भी परिवार में ही विरोध झेलना पड़ा। यहां तक की साल 2012 के चुनाव में उनका छोटा पुत्र सौरभ स्वरूप ही सपा से टिकट लेने में सफल हो गया था, लेकिन पिता के सम्मान में सौरभ ने यह टिकट लौटा दिया। इससे पहले भी विष्णु स्वरूप के परिवार से भी चितरंजन के सामने चुनौती पेश की गयी थी, लेकिन परिवार की एकता की खातिर सारा विरोध और विवाद थाम लिया जाता रहा।

चितरंजन स्वरूप के निधन के बाद 2016 में स्वरूप परिवार की राजनीतिक विरासत को लेकर परिवार में फिर से विवाद हुआ, लेकिन चितरंजन की इच्छा की खातिर उनके बड़े पुत्र गौरव स्वरूप को परिवार की सियासी विरासत सौंप दी गई। 2016 के उपचुनाव और 2017 के चुनाव में गौरव स्वरूप को सपा ने प्रत्याशी बनाया। इन दोनों चुनाव में गौरव को पराजय का सामना करना पड़ा। दोनों चुनाव में उनके छोटे भाईयों सौरभ स्वरूप बंटी और विकास स्वरूप बब्बल ने भरपूर साथ दिया। पूरे परिवार ने उनको मिलकर चुनाव लड़वाये, लेकिन इस बार के चुनाव में गौरव की सपा से दावेदारी के बीच उनका ही छोटा भाई सौरभ बंटी आ खड़ा हुआ। सौरभ ने सपा में सक्रियता बढ़ाई और एक स्थानीय नेता के साथ मिलकर वह सदर सीट से सपा रालोद गठबंधन में टिकट पाने में सफल हो गये। आज वह रालोद प्रत्याशी के रूप में नल के निशान पर चुनाव मैदान में है।

इस चुनाव के लिए टिकट की दौड़ में अपने ही छोटे भाई से पिछड़ने के कारण गौरव स्वरूप नाराज हो गये, लेकिन सभी को उम्मीद थी कि हर बार की भांति इस बार भी स्वरूप परिवार नाराजगी के बावजूद चुनाव में एकजुट नजर आयेगा, लेकिन 55 साल का राजनीतिक इतिहास रखने वाला स्वरूप परिवार आज दो भाईयों के बीच चली टिकट की राजनीतिक लड़ाई के कारण सियासी पैमाने पर बिखर चुका है। गौरव स्वरूप ने अपने भाई को चुनाव लड़ाने का निर्णय न करते हुए पार्टी ही बदल दी। उन्होंने शुक्रवार को लखनऊ में भाजपा ज्वाइन कर ली। इस राजनीतिक उठापटक में अब गौरव स्वरूप सदर सीट पर अपने भाई के सामने ही प्रचार के लिए निकलने को तैयार हैं तो वहीं संयोग से वह उसी पार्टी और प्रत्याशी के लिए जनता के बीच जाकर वोट मांगते दिखाई दे सकते हैं, जिसके खिलाफ उन्होंने अभी तक राजनीति की और चुनाव लड़ने के साथ ही बड़े पैमाने पर वोट हासिल किये हैं। गौरव स्वरूप के राजनीतिक दलबदल से सभी भौचक्क हैं और उनके इस निर्णय को सौरभ स्वरूप के राजनीतिक भविष्य से भी जोड़कर देखा जाने लगा है। सियासी गलियारों से निकली इस खबर को लेकर शहर से गांव तक की चौक चौपालों पर राजनीतिक जुबां यह भी चुगली कर रही है कि गौरव स्वरूप द्वारा उठाया गया कदम उनके राजनीतिक भविष्य को चौपट भी कर सकता है।

Next Story