लोकसभा का टिकट पक्का करेगा खतौली का परिणाम

भाजपा फिसली तो मिशन-2024 में नया फैसला ले सकता है हाईकमान, रालोद जीती तो संसदीय संग्राम में खत्म होगी अखिलेश की दावेदारी, चंद्रशेखर आजाद के लिए सियासी संजीवनी बन सकता है खतौली सीट का परिणाम

Update: 2022-12-07 11:56 GMT

मुजफ्फरनगर। खतौली उपचुनाव के लिए जनता के फैसले की घड़ी अब आ चुकी है। यह चुनाव केवल भाजपा की भगवा पताका को थामकर अपने पति की राजनीतिक विरासत बचाने के लिए सियासी संग्राम में उतरीं राजकुमारी सैनी या फिर रालोद और सपा के गठबंधन के सहारे आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर का हाथ थामे जयंत के कंधों पर सवार मदन भैया की किस्मत से ही जुड़ा नहीं है, इस चुनाव का परिणाम मिशन 2024 के लिए मुजफ्फरनगर में संसदीय चुनावी संग्राम की सूरते हाल को भी साफ करने वाला साबित होगा। खतौली उपचुनाव के नतीजे ही कहीं न कहीं 2024 में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव के लिए टिकट की गारंटी को पक्का करने का काम करने वाले भी साबित होने जा रहे हैं। इसी चुनाव से भाजपा की ओर से डॉ. संजीव बालियान और विपक्षी सपा व रालोद की ओर से अपने कोटे की दोवदारी को सुरक्षित रखने का परिणाम भी जनता देने जा रही है। इतना ही नहीं यह चुनाव चंद्रशेखर आजाद के राजनीतिक भविष्य के लिए भी एक सियासी संजीवनी के तौर पर देखा जा रहा है।

खतौली उपचुनाव विपक्ष के लिए तो भाग्य के बल पर टूटे छींके जैसा ही अवसर बनकर आया है, लेकिन सत्ता पक्ष के लिए यह सिर मुंडाते ही ओले जैसा बनकर रह गया है। खतौली उपचुनाव को लोकसभा चुनाव के लिए दावेदारी से जोड़कर भी देखा जा रहा है। साल 2014 में जिले में बड़ी जीत दर्ज करने वाले डॉ. संजीव बालियान ने इसके बाद कई जीत भाजपा की झोली में डाली है, लेकिन इस जीत के बाद से ही डॉ. संजीव बालियान के सामने कई सियासी चुनौतियां भी बनीं हैं। हालांकि हर चुनौती को उन्होंने पूरी दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ पूर्ण ही नहीं किया, बल्कि तमाम पूर्वाग्रहों को भी गलत साबित करने का काम कर दिखाया है। खतौली उपचुनाव में भाजपा की प्रत्याशी भले ही राजकुमारी सैनी हों, लेकिन यह चुनाव केन्द्रीय राज्यमंत्री और स्थानीय सांसद डॉ. संजीव बालियान की राजनीतिक प्रतिष्ठा से ज्यादा जुड़ा हुआ है।

खतौली उपचुनाव का परिणाम क्या होगा, यह तो 08 दिसम्बर के दिन तय हो ही जायेगा, लेकिन यहां पर सत्ता पक्ष की जीत और हार पूरा राजनीतिक परिदृश्य ही बदलने वाली साबित हो सकती है। राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं पर ध्यान दिया जाये तो खतौली उपचुनाव सीधे तौर पर मिशन 2024 की दावेदार को मजबूती प्रदान करने वाला साबित हो सकता है। लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा से अभी तक केन्द्रीय राज्यमंत्री डॉ. संजीव बालियान को ही मुख्य तौर पर टिकट का दावेदार माना जा रहा है। इसके साथ ही भाजपा से दूसरे नेता भी टिकट का जुगाड़ करने में जुटे हुए हैं। वहीं यह चुनाव संजीव बालियान और जयंत चौधरी की चौधराहट को भी कायम करने वाला साबित होगा। सूत्रों के अनुसार सपा भी मुजफ्फरनगर संसदीय सीट पर दावेदारी कर रही है। यहां पर सपा से हरेन्द्र मलिक को मजबूत दावेदार माना जा रहा है। वहीं खतौली चुनाव लड़ चुके राजपाल सैनी भी लोकसभा चुनाव में टिकट के लिए मुख्य तौर पर रालोद कोटे से सबसे ऊपर चल रहे हैं। राजपाल सैनी को बिजनौर का विकल्प भी भा रहा है, लेकिन खतौली उपचुनाव में मदन भैया की जीत जयंत की मुजफ्फरनगर संसदीय सीट पर दावेदारी को सपा के मुकाबले ज्यादा मजबूत करने का काम करेगी। विधानसभा चुनाव में रालोद के जिले में तीन विधायक जीते थे, यदि विपक्ष ने भाजपा से उसका सबसे मजबूत सियासी दुर्ग खतौली छीना तो जयंत की चौधराहट तो कायम होगी ही, गठबंधन में रूतबा भी बढ़ेगा। ऐसे में जयंत ही मुजफ्फरनगर संसदीय सीट पर अखिलेश की दावेदारी के सामने मजबूत दावा पेश कर सकते हैं। रालोद कोटे से लोकसभा चुनाव के लिए जयंत के भी मैदान में आने की पूरी संभावना व्यक्त की जा रही है, नहीं तो रालोद से चरण सिंह परिवार के किसी वफादार को टिकट की सौगात दी जा सकती है। वहीं इस चुनाव में आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद की एंट्री भी नया ट्विस्ट पैदा करने वाली साबित हो सकती है। मदन की जीत के बाद चंद्रशेखर 'इनाम' में टिकट भी मांग सकते हैं। वैसे तो उनके साथ हाथ मिलाने पर उसको लोकसभा चुनाव में एडजस्ट करने का भरोसा मिला है। चंद्रशेखर के नाम पर पहले अखिलेश तैयार नहीं थे, लेकिन जयंत ने उनको मनाने का काम कर दिखाया और वो गठबंधन में शामिल हुए हैं। खतौली के दलित नल पर गये तो चंद्रशेखर मुजफ्फरनगर सीट से भी गठबंधन का चेहरा बनाये जाने के लिए हाथ पांव मारने में पीछे नहीं रहेंगे। यह तो भविष्य की बात है, लेकिन इतना तय है कि खतौली उपचुनाव का परिणाम ही लोकसभा चुनाव 2024 में मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर टिकट को पक्का करने वाला साबित होगा। इसमें यदि भाजपा हारी तो संजीव बालियान संकट में आ सकते हैं, क्योंकि 2014 में अपने संसदीय क्षेत्र की पांचों विधानसभा सीटों मुजफ्फरनगर, बुढ़ाना, खतौली, चरथावल और सरधना जीतने वाले संजीव बालियान 2019 में बुढ़ाना और चरथावल हारे, इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में बुढ़ाना और चरथावल के साथ ही सरधना सीट भी हार गये। अब यदि खतौली गई तो भाजपा का मिशन-2024 चिंतन और मंथन के भंवर में फंस जायेगा।

संजीव बालियान के लिए कार्यकाल के अंतिम दिनों में संकट का संयोग

मुजफ्फरनगर। केन्द्रीय राज्यमंत्री डॉ. संजीव बालियान के पिछले और इस कार्यकाल में सियासी संकट के संयोग की बात करें तो अमूमन दोनों ही कार्यकाल के अंतिम दिनों में वो सियासी बिसात पर विरोधियों की चुनौतियों के कारण घिरे दिखाई दिये हैं। पिछले लोकसभा चुनाव 2014 में संजीव बालियान मोदी लहर के कारण 6 लाख से ज्यादा वोट लेकर 4 लाख एक हजार मतों के बढ़े अंतर से सांसद निर्वाचित हुए थे। इतने बढ़े अंतर की जीत ने ही उनको पीएम बने नरेन्द्र मोदी का विश्वास पात्र बनाया और वो मोदी मंत्रीमण्डल का हिस्सा बने, लेकिन उनके कार्यकाल का अंतिम सफर आया तो संकट मंडराया और उनको विपरीत परिस्थितियों में मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि भाजपा उत्तर प्रदेश में उनको उपाध्यक्ष बनाया गया। ऐसा ही कुछ इस बार के कार्यकाल के साथ भी जुड़ा दिखाई दे रहा है। इस समय वो भाजपा के साथ ही अपने मिशन 2024 में जुटे हुए हैं। मुजफ्फरनगर संसदीय सीट से भाजपा के टिकट के लिए तीसरी बार दावेदार भी उनको ही मुख्य तौर पर माना जा रहा है, लेकिन खतौली के उपचुनाव के आकस्मिक संकट ने उनके सामने अपनी दावेदारी को सुरक्षित रखने की बड़ी चुनौती पैदा करने काम किया है। यह चुनाव ही उनके इस कार्यकाल के अंतिम दिनों में संकट के रूप में देखा जा रहा है। खतौली में यदि परिणाम विपरीत हुए तो संजीव बालियान के सामने अपना टिकट बचाने की चुनौती भी पैदा होगी, ऐसा भाजपा के ही कुछ लोगों का मानना है और सियासी चर्चाओं की सज रही चौपालों पर भी कुछ इसी तरह की चुगली सर्द रातों में शीतलहर के बीच सियासी गरमाहट की बयार की दस्तक देती नजर आती हैं।

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